इन शहरों के भी क्या कहने....

अपूर्ण इन शहरों के भी क्या कहनेबस रंग बिरंगे कपडे हैं पहने ....दिन के उजियारे में जब सूरज तेज दिखाता हैधुंए के मोटे कम्बल को भेद कभी ना पाता हैवो चंचल किरणे जो कहीं ठिठोली करती हैंबैठ वहीँ, शहरों को अब देख देख वो रोती हैंइन शहरों के भी क्या कहनेबस रंग बिरंगे... [पूरी पोस्ट]
writer निपुण पाण्डेय
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[29 Apr 2010 03:43 AM]

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