वो कुमकुम बिंदी

अथाह... आज भी लटका है तेरा दुपट्टा खूंटी पर किसी अमिट निशानी की तरह,तेरी लाल चूड़ियों के कुछ टुकड़े मेरे पैरों में चुभते है बीती ख़ुशी की तरह।लगता है जैसे छिटकती हो तेरे रूप की चाँदनी इस घर के आँगन में,आज भी खिलखिलाते है गुलमोहर के फूल छत पर पड़े तेरी हँसी के... [पूरी पोस्ट]
writer राजेन्द्र मीणा

मेरी कविताएँ

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[29 Apr 2010 04:35 AM]

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