॥ हे मैना पाखी॥
(मुंडारी लोकगीत का काव्यांतर : चौदह)हे मैना पाखी!देखो, सिसई का चारागाहजलने लगा हैतुम कहां चुगने जाओगी?देखो मैना,तुम्हारा तेलई का मैदान भीझुलसने लगा हैकहां से तुम चुनोगी तिनका?देखो, आधा चारागाह जल रहा हैतो आधे में चुगोझुलसते मैदान के बचे हुएहिस्से में...
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अरविन्द चतुर्वेद
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[29 Apr 2010 04:02 AM]



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