ग़ज़ल अपनी अपनी

एक नई शुरुआत चल चल के पड़े हैं आन्टन फांसो ने पैर फोड़ा है घिसी हुई है चप्पल पर कब चलना छोड़ा हैहो गया है तन भी भट्ठे की नीली इंट सा रखे हाथ पेट पर कब लू में जलना छोड़ा है अब भी बगल में रेडियो बजता है पांथ में सर पर चढ़ते सूरज ने कब ढलना छोड़ा... [पूरी पोस्ट]
writer jagdeep singh

ग़ज़ल

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[29 Apr 2010 02:33 AM]

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