काश मेरे पास कुछ होता सुबूत
काश मेरे पास कुछ होता सुबूत।दे न पाया बेगुनाही का सुबूत॥हो चुका है नज़्रे-आतश सारा जिस्म,ये सुलगती राख है ज़िन्दा सुबूत्॥क़ाज़िए-दिल वक़्त का नब्बाज़ है, देख लेता है ये पोशीदा सुबूत्॥इश्क़े-मजनूँ क्यों न होता लाज़वाल, दे रही है आजतक लैला सुबूत्॥कैसे-कैसे...
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युग-विमर्श
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[29 Apr 2010 01:03 AM]



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