संजीवनी
"सृजन, चिन्तन, मंथन का प्रतिरूप हो तुम,मन की स्वरलहरिया का स्वरूप हो तुम,विचारों के आवेग में बसने वाले,मेरी अभिव्यक्ति, मेरी अनुभूति का अभिप्राय हो तुम,तीव्र तृष्णा के बीच में अतृप्त सा मन,मन की मृग-तृष्णा को दूर करने का आधार हो तुम,नहीं लांघना मर्यादाओं...
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भीमसिंह मीणा
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[27 Apr 2010 06:35 AM]



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