वृद्धाश्रम : मकान या मानसिकता

पिताजी ‘काल बेल’ की आवाज से ही नींद खुली। घड़ी देखी, अभी साढ़े छः ही बजे थे। दरवाजा खोला तो विश्वास नहीं हुआ। काका साहब सामने खड़े थे! उन्हें कोई वाहन चलाना नहीं आता। सायकिल भी नहीं। याने, लगभग सत्तर वर्षीय काका साहब, त्रिपोलिया गेट से कोई तीन किलोमीटर पैदल चलकर,... [पूरी पोस्ट]
writer विष्णु बैरागी

विष्णु बैरागी

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[28 Apr 2010 22:50 PM]

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