लाख शब्दों में एक बात..बंद करो बंद करो!
बस और नहीं..कहा ना अब और नहीं झेला जाता यह शब्दों और समय के साथ होता हुआ दुर्व्यवहार। आप ही कहिये कब तक झेलें हम इन अल्ल्हड़ और पढ़े लिखे जाहिलों की जमात को। जब बोलना शुरू करते हैं तो ख़त्म होने का नाम ही नहीं लेते। एक बात को जब तक पचास तरीके से न बोल लें...
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पियूष अग्रवाल
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[28 Apr 2010 14:24 PM]



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