फोन कुछ पलों के लिए गुंगा हो गया.....

काहे को ब्याहे बिदेस.... हज़ारों मील दूर जिस ज़मीन के टुकड़े का विस्तार और मिट्टी का रंग भी याद नहीं उस पर सोने की बालियाँ उगी नज़र आती हैं... जिस बाग़ के पेड़ों के फल का स्वाद जुबान से घीसे पत्थर की तरह उतर चुका है उसकी रखवाली के लिए हर साल बागवान बदला जाता है शायद... [पूरी पोस्ट]
writer neera
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[28 Apr 2010 12:09 PM]

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