शाम को अच्छे भले बैठे थे चाय पीकर, खटिया पर लुडक गये,
बुड्ढ़े को जवानी छाईरोम रोम ने ली अंगड़ाईदिमाग की बत्ती जलाईचौक से हेयर डाई मंगवाईसुबह हुई रंगाई पुताईदोपहरी में हुई सुखाईशाम को गली में खटिया लगाईछम्मकछल्लो को आवाज लगाई बहुत दिन हुए हरजाईआशिक की गली तू न आईछम्मक छल्लो इतराती चली आईओंठ दबाये...
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यशवन्त मेहता "फ़कीरा"
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[28 Apr 2010 08:54 AM]



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