बन्धनों में रहूँ मैं ये संभव नहीं

युग-विमर्श  (YUG -VIMARSH)   یگ ومرش बन्धनों में रहूँ मैं ये संभव नहीं॥अनवरत साथ दूँ मैं ये संभव नहीं॥मेरी प्रतिबद्धता का ये आशय कहाँ, झूट को सच कहूँ मैं ये संभव नहीं॥मैं हूँ मानव,मैँ तोता या मैना नहीं,जो पढाओ पढूँ मैं ये संभव नहीं॥पत्थरों में प्रतिष्ठित करूँ प्राण मैं,सब के आगे झुकूँ मैं... [पूरी पोस्ट]
writer युग-विमर्श
views
13
upvote
1
downvote
0
rating
1
comments
3
[28 Apr 2010 06:45 AM]

Free Vedic Astrology From Astrobix