कली चटकी कहीं, फूल खिला कोई

नीरव कली चटकी कहीं, फूल खिला कोईमन उपवन था उजड़ा-सापतझड़ था युगों से आँगन मेंआई बसंत बहार लाया उसे बुला कोईकूक कोयल की, भँवरे का गुँजनतड़प रहा था, कबसे सुनने को मनमन मुराद पूरी हुई, शुभ घड़ी आया कोईगुलाब खिला, मोगरा महकासंदल चहका, मन खुश्बू से बहकामन जैसे... [पूरी पोस्ट]
writer डॉ. राजेश नीरव
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[28 Apr 2010 02:46 AM]

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