लाठी खालि, गुली खालि...

पुण्य प्रसून बाजपेयी लाठी खालि,गुली खालि/ तेबू नाहि सोराज पालि / घरे नाथे अन किरे / कैसे बांची प्राण... है यह जिन्दगी का संघर्ष लेकिन अंधेरे में गूंजती महिलाओं की यह आवाज एकदम छोटे बच्चों के लिये लोरी का काम करती है और धीरे धीरे महिलायें जब आश्वस्त हो जाती हैं कि बच्चे सो... [पूरी पोस्ट]
writer Punya Prasun Bajpai

नक्सली

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[28 Apr 2010 00:37 AM]

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