पंख उड़ाती कहाँ चली- आकांक्षा यादव
तितली रानी,तितली रानीपंख उड़ाती कहाँ चलीघूम रही हो गली-गलीअभी यहाँ थी,वहाँ चली.काश हमारे भी पंख होतेसंग तुम्हारे हम उड़ लेतेरंग-बिरंगे पंख तुम्हारेमन को भाते हैं ये सारे. जब भी तुमको चाहें छूना पास नहीं तुम आती होफूलों का रस लेकर झट से क्यूँ उड़ जाती...
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Akanksha~आकांक्षा
आकांक्षा यादव
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[27 Apr 2010 22:30 PM]



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