दर्द-ए-दिल दिल तक ही रखूँ, यह ज़रूरी तो नहीं

जीवन के पदचिन्ह दर्द-ए-दिल दिल तक ही रखूँ, यह ज़रूरी तो नहीं,सरेआम रों दूँ, पर ऐसी भी मेरी मजबूरी  तो नहीं ज़माने का दस्तूर निभाना, है हिदायत वाइज़  की फिर मिलेगी जन्नत पर यह उम्मीद पूरी तो नहींडरता हूँ बेअदबी की तोहमत न दे... [पूरी पोस्ट]
writer Sudhir (सुधीर)

दर्द

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[27 Apr 2010 14:00 PM]

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