मिर्ज़ा ग़ालिब के चन्द शेर
है तेवरी चढ़ी हुई, अन्दर निकाब के,है इक शिकन पड़ी हुई, तर्फ़े निकाब में ।अर्थात् "जब उनके सामने ऐसा ज़िक्र आ जाता है कि कोई भेद खुल रहा हो, या कोई अनचाही बात निकल पड़ी हो तो बोलती नहीं हैं पर घूँघट भी उनके तेवरी चढाने और कटाक्ष को छुपा नहीं पाता । कहते हैं,...
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अनिल कान्त :
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[27 Apr 2010 13:24 PM]



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