इस शहर में अब मन नहीं लगता...

अर्ज़ है... बंसत निकल चुका था... हर तरफ फागुन की मस्ती छाई थी.. खेतों में गेंहूं की फसल कट चुकी थी... गन्ना भी खेतों से उठ चुका था... दिल्ली में बहुत दिन रहने के बाद अकेलेपन में घर की याद सताने लगी थी... मैंने दफ्तर से कुछ दिन की छुट्टी ली और अपने घर चला गया... घर... [पूरी पोस्ट]
writer अबयज़ ख़ान
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[27 Apr 2010 13:10 PM]

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