चन्द शेर : मिर्ज़ा ग़ालिब

मिर्ज़ा ग़ालिब तमाशा कि ऐ महवे-आईन:दारीतुझे किस तमन्ना से हम देखते हैं ।अर्थात् " ओ दर्पण में अपने को देखने में तल्लीन ! ज़रा इधर भी तो देख कि हम किस तमन्ना के साथ तुझे देख रहे हैं !"आज हम अपनी परीशानिए ख़ातिर उनसेकहने जाते तो हैं, पर देखिये क्या कहते हैं ।अर्थात् "आज... [पूरी पोस्ट]
writer अनिल कान्त :
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[27 Apr 2010 13:14 PM]

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