एक अनंत सत्य की तरह
आज भी है नवनिर्मित कुछ नित्य की तरह ,बस वही सुबह , एक अनंत सत्य की तरह ।उकास का कारवां चला आ रहा है ,स्वप्न खग के परों को कुतरते हुए ।आसमां का रंग स्याह हो गया है ,भोर ने जकड़ ली है ,बाहें धुंध की ।समय की लय अनवरत कर रही है ,हवा से मिलकर गुबार की साजिश...
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राजेन्द्र मीणा
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[27 Apr 2010 12:26 PM]



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