छुप बैठा कोई रे
छुप बैठा कोई रे जीवन सितार मेंजाने वो कैसे उतरे स्वर के निखार में ||इक रात ऐसी थी गहरे अँधेरे मेंजागी प्रतिज्ञा मेरी अपनों के घेरे मेंसपने वे सोये मेरे गहरे विचार में ||प्राण बटोही मेरे युग के प्रभात मेंचलते रहे है किन्तु ठहर न रात मेंभटके वे मेरे साथी...
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क्षत्रिय
स्व.श्री तन सिंह जी कलम से
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[27 Apr 2010 10:36 AM]



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