कल थीं रसमय भूल गयी हैं

युग-विमर्श  (YUG -VIMARSH)   یگ ومرش कल थीं रसमय भूल गयी हैं ।कविताएं लय भूल गयी हैं॥अहंकार-गर्भित सत्ताएं, विजय परजय भूल गयी हैं॥समय खिसकता सा जाता है, कन्याएं वय भूल गयी हैं॥लगता है अपनी ही साँसें, अपना परिचय भूल गयी हैं॥ संघर्षों में रत पीड़ाएं, मन का संशय भूल गयी हैं॥हाथ की रेखाएं भी... [पूरी पोस्ट]
writer युग-विमर्श
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[27 Apr 2010 10:34 AM]

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