'होता है तो होने दो'
हर रोज़ ये सुबह पूरब से, पश्चिम को करवट लेती है,अपना ही सूरज पूरब में,जो ढलता है तो ढलने दोसालों से मिट्टी की खुशबू,बस यादों में ही बाकी है,साँसों का दम धुएं में,ग़र घुटता है तो घुटने दोरंगों की इतनी बेहतर,कहाँ रोज़ नुमाइश होती है,आस्मां मे भरने को...
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Yogesh Sharma
'होता है तो होने दो'
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[27 Apr 2010 09:15 AM]



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