मैं जिसको ढूँढता हूँ, वो लखनऊ कहाँ है
माना बहुत हंसी है, माना बहुत जवां है मैं जिसको ढूँढता हूँ, वो लखनऊ कहाँ है यादों की सरज़मी है, ख़्वाबों का आसमां है बस्ती है नवाबों की, शहरे सुखन-वरां है सब कुछ है जैसे फिर भी हर शै धुंआ-धुंआ है मैं जिसको ढूँढता हूँ वो लखनऊ कहाँ है इक्के हैं अब न तांगे...
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हिमांशु बाजपेयी
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[27 Apr 2010 03:56 AM]



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