तुम सिर्फ एक कविता नहीं हो
तुम सिर्फ एक कविता नहीं हो ...तुम ...मेरे जिस्म की उस गंध के समान हो...जो लिपटी पड़ी हैं...मेरी हथेली की रेखाओं से ...एक समान दो जिस्मों की सुवास...जो एक अकेली गंध पर हावी है...जो एक अनकही... अनजानी...अनदेखी दुनिया में...कहीं ना कहीं ...मेरे वजूद का...
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हेमन्त वशिष्ठ
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[27 Apr 2010 03:18 AM]



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