॥ कंदमूल और मछलियां॥
(मुंडारी लोकगीत का काव्यांतर : ग्यारह)भेलवा और कुसुम के पेड़ों वाली ढलान परदेखो, लहलहा रहे हैं कंदमूलझाड़ियों से ढंके नाले औरलताओं से पटी तराई के पानी मेंमछलियां खेल रही हैं आंखमिचौनीलहलहाते कंदमूल को खोद लाओ दोस्तआंखमिचौनी खेलती मछलियां पकड़ लाओ!अरे दोस्त,...
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अरविन्द चतुर्वेद
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[27 Apr 2010 03:04 AM]



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