एक और ग़जल
एक और ग़जल फिर से पेश करना चाहूँगा.. अजब सा नशा है कुछ ग़जल लिखने का भी.. कोई भुल चुक हुई हो तो टिपण्णी के रूप मे जरुर उसे उभरें.. अभी बस सीखने की कोशिश भर कर रहा हूँ.. आप से अच्छा कौन आंकलन कर पायेगा... अज़ाब तेरी हाफिजाह का सह भी नहीं पाता,पर तेरे...
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हिमांशु पन्त
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[27 Apr 2010 02:42 AM]



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