ब्रह्मकमल
गीली माटी पर बने पदचिन्ह सूख जाते हैं, मगर हिमालय की चट्टानी सतह पर नए अंकुरों का स्वागत करती है प्रकृति नभ का विस्तार सदा वैसा ही, पर धरती का श्रृंगार सदा बदला करती है प्रकृति पावस के आते ही पर्वतों के दुर्गम स्थानों मेंे सौंदर्य का नया उल्लास फटते देखा...
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swati
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[26 Apr 2010 23:52 PM]



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