मुझे मिले वे चरण
प्राण तरसते रहे निरंतर, मिला किसी का प्यार नहीं,मुझे मिले वे चरण कि जिन पर कुछ मेरा अधिकार नहीं ! मंजिल दूर, डगर अनजानी, जीवन पथिक थका हारा,एकाकी सर्वस्व लुटा कर फिरता है मारा-मारा,निज अभीष्ट मंदिर का जिसने पाया अब तक द्वार नहीं,मुझे मिले वे चरण कि जिन...
[पूरी पोस्ट]
Sadhana Vaid
13
0
0
0
10
[26 Apr 2010 22:51 PM]



Shuffle







