आज लगा अपवाद हो गये
जो अपने से हो न सका है अब तक वह संवाद हो गयेएक अजनबी सी भाषा का अनचाहा अनुवाद हो गये कथाकार तो राजद्वार पर चाटुकारिता में उलझे थेइसीलिये संदेसे जितने नीतिपरक थे गौण रह गयेललित भैरवी के पदचिह्नों पर चल पाने में अक्षम थाबंसी के स्वर सारंगी की ओढ़ उदासी मौन...
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Geetkaar
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[26 Apr 2010 21:43 PM]



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