इक अरसा हुआ धूप में दाढ़ी बनाए हुए

उधेड़-बुन इक अरसा हुआ धूप में दाढ़ी बनाए हुएइक दड़बे में घुस के श्रृंगार करते हैंहमसे बड़ा कालिदास कोई और क्या होगारोज अपने ही चेहरे पे तेज धार करते हैंकहते हैं कि उठा लेगा उठानेवाला एक दिनऔर हम हैं कि अलार्म पे ऐतबार करते हैंपीढियां अक्षम हुई हैं, निधि नहीं जाती... [पूरी पोस्ट]
writer Rahul Upadhyaya

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[26 Apr 2010 19:38 PM]

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