मन का पंछी दूर गगन में
मन का पंछी दूर गगन में टोह लगाता आया रे |इस जीवन में धीरे धीरे गीत किसी ने गया रे ||नदियाँ देखि पर्वत ढूंढे रत्नाकर आएलाख इशारे आने के पर मुझको न भाएउड़ता आया बोलो किसने ये अनुराग जगाया रे ||कैसी गांठे बाँधी थी जो खुलने न पाईरंगत कैसी युग भी बीते घुलने न...
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क्षत्रिय
स्व.श्री तन सिंह जी कलम से
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[26 Apr 2010 13:40 PM]



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