दरी

एक नई शुरुआत गुड्डी हर रोज काम से निबट बिछा लेती है अड्डा बुनती है दरी ठोंकती है पंजे से कतरनों को ताने में पिरोती हुईउसे लगता है उसे भी बनाया है ठोंककर दरी की तरह ही पूरी होने पर अड्डा तो छुट जाता है पर ताना... [पूरी पोस्ट]
writer jagdeep singh

कविता

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[26 Apr 2010 12:28 PM]

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