नव गीत: झुलस रहा गाँव..... --संजीव 'सलिल'
*झुलस रहा गाँवघाम में झुलस रहा...*राजनीति बैर की उगा रही फसल.मेहनती युवाओं की खो गयी नसल..माटी मोल बिक रहा बजार में असल.शान से सजा माल में नक़ल..गाँव शहर से कहो कहाँ अलग रहा?झुलस रहा गाँवघाम में झुलस रहा...*एक दूसरे की लगे जेब काटने.रेवड़ियाँ चीन्ह-चीन्ह...
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आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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[26 Apr 2010 12:00 PM]



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