दिल भात की पतीली का ढक्कन हो गया है

मौन के खाली घर मे-                                       ओम आर्य मैं जानती हूँतुमने देख ली होगीमेरे होंठों पे वो कांपती हुई कशिशऔर उनपे बार-बार जीभ फेर करभिंगाने की मेरी विवशताऔर भांप ली होगी वो कमजोरी भीजिसकी वजह से कोईकिसी की बांहों में निढाल हो जाता हैउस कुछ देर की मुलाक़ात मेंअब बताऊँ भी तोसदा गतिमान होने का दंभ... [पूरी पोस्ट]
writer ओम आर्य
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[26 Apr 2010 11:55 AM]

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