आँखों से ओझल नहीं होता
वो कौन सी महफ़िल है जिसमें दिलबर नहीं होताहो सामने या छिपा दिल में , वो रहबर नहीं होतातन्हाई भी करती है शिकायतकि इक पल भी वो आँखों से ओझल नहीं होताखबर तो उसको भी है इतना भी वो बेखबर नहीं होतावो कौन सी महफ़िल है जिसमें दिलबर नहीं होतादिन हो के रात हो...
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शारदा अरोरा
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[26 Apr 2010 01:59 AM]



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