नव निधि के उजाले

निनाद गाथा ज्ञान के कारागृहों में दंभ के मुस्तैद ताले, भवन की ऊँची छतों पर रूढ़ियों के सघन जाले, देख कर विज्ञान की प्रगति विधि भी है अचंभित, हो पुरातन या नवल जो व्यर्थ है, वो सब तिरोहित, हम पताका हम ध्वजा हम स्वयं ही पहिये हैं रथ के, दो दिशाओं में हैं गुंजित... [पूरी पोस्ट]
writer अभिनव
views
9
upvote
0
downvote
0
rating
0
comments
5
[26 Apr 2010 01:29 AM]

Free Vedic Astrology From Astrobix