उत्तीर्ण होता ही रहूँगा
लो परीक्षा चाहे जितनी तुम मेरे विश्वास की प्रिय है अडिग विश्वास मैं उत्तीर्ण होता ही रहूँगा अर्चना के दीप की लौ चाहे जितनी थरथराये पंथ हर पग पर स्वयं ही सैंकड़ो झंझा उगाये द्रष्टि के आकाश पर केवल उमड़ते हों बगूले और चारों और केवल चक्र वायु सनासनाये डगमगा...
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राकेश खंडेलवाल
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[25 Apr 2010 22:04 PM]



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