कहीं भी तो लहर की बानगी हमको नहीं मिलती

कुछ इधर से  ,कुछ उधर  से नदी के तीर पर ठहरेनदी के बीच से गुज़रेकहीं भी तोलहर की बानगीहमको नहीं मिलतीहवा को हो गया है क्यानहीं पत्ते खड़कते हैं'घरों में गूँजते खंडहरबहुत सीने धड़कते हैंधुएँ के शीर्ष पर ठहरेधुएँ के बीच से गुज़रेकहीं भी तोनज़र की बानगीहमको नहीं मिलतीनक़ाबें पहनते... [पूरी पोस्ट]
writer दीपक गर्ग

--विनोद श्रीवास्तव

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[25 Apr 2010 13:02 PM]

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