एक ख्वाब की कब्रगाह
लो मर गई मरजानी तब भी चैन नहीं देह से झांक कर देख रही है तमाशा कुनबुना रहे हैं पति बेवजह छूट गया दफ्तर सोमवार के दिन ही बच्चों की छटपटाहट काश मरतीं कल शाम ही नहीं करनी पड़ती तैयारी टेस्ट की अब कौन लाए फूलों की माला इस तपती धूप में नई चादर कौन करे फोन कि...
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डॉ वर्तिका नन्दा
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[25 Apr 2010 13:04 PM]



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