शाश्वत मौन तोड़ने की कोशिश में...एक छोटी सी कविता
समाज में ऐसा तो हो ही नहीं सकता कि आप घर पर ही दुबके बैठे रहें, किसी न किसी काम से घर के बाहर आना ही पड़ता है। बाहर आने के बाद आपको दुनिया की सच्चाई दिखाई देती है। जो सच्चाई अभी तक आप समाचारों के माध्यम से, लोगों के द्वारा सुनते चले आ रहे थे उसे अपनी...
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डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
कविता
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[25 Apr 2010 11:08 AM]



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