आत्मकथ्य
यह प्रारंभनहीं है निमेश भर, मायापाश काऔर न ही अंतिम मुक्ति का प्रश्वास;यह तिमिर हैचिरसंचित,चिरकालीनउस दिन सेजब वे मुझे कैद कर गए थेरहस्य-गर्भ स्पंदित कारागारों में ;तब रुद्ध-सिंहा मेरी आत्माबच निकली थी,वातायन वेदना के दौरानउन सघनित लोहे की सलाखों...
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धीर.
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[25 Apr 2010 05:58 AM]



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