फिर गूंजे चाहत संगीत
तुम मेरे लिए नहीं थे पड़ाव भरना ही किसी तृष्णा की तुष्टि का साध्यफिर क्योंकुंठाओं की धरती पर बलिदान हुआ हमारा प्रेमपूछता है मेरे प्रेम का ज़िद्दी राग, मुझसे ही जोर-जोर सेहृदय अब भी चाहता है...बना रहे रागपररात भर, मंद-मंद कर रिसता हैकानों मेंकुहुक नहीं,...
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चण्डीदत्त शुक्ल
कविता
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[25 Apr 2010 05:33 AM]



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