बेग़म परवीन सुल्ताना-ठुमरी -तुम राधे बनो श्याम
ये आवाज़ - मानो नदी की कोई महीन धारा, कलकल करती, मधुर ध्वनि से आहिस्ता-आहिस्ता पहाड़ उतर रही हो.... एक तारों भारी रातमेरी अपनी यादों में सिक्किम की हल्की, पिस्तई तीस्ता सदा हरहराती है या फिर बाड़गंगा का धीमा मद्धम बहाव जो पहाड़ी की ओट होते ही कभी कानो तक...
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पारूल
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[25 Apr 2010 03:26 AM]



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