विस्तार
विस्तार मेरे नैनों के नीलाभ व्योम में, एक चन्दा, एक बदली और कुछ झिलमिल तारे रहते हैं. सावन में, जब घनघोर घटायें उमड़ घुमड़ कर,आँखों में खो जाती हैं. चन्दा, तारे सो जाते हैं. वर्षों मरु थे, जो पोखर सारे,स्वमेव ही भर जाते हैं. कभी...
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रचना दीक्षित
कविता
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[25 Apr 2010 01:13 AM]



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