आखिर हर्ज़ ही क्या है!
सोच रहा हूँ ज़िन्दगी से थोडा कुछ मांग लेने में हर्ज़ ही क्या है।सर्दियों की थोड़ी नर्म सी धूप,और साथ में अपने गाँव के पीपल की छांव,कुछ मट्टी भी मांग लेता हूँ गंगा किनारे की,बारिश में नहाये खेतों की भीनी खुशबू के साथ,सुबह के पंछियों की चेह्चाहाट भी मिल...
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पियूष अग्रवाल
कविता
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[24 Apr 2010 13:58 PM]



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