तीन त्रिवेनियाँ (२)

कोना एक रुबाई का १जागी जागी सी सोयी सोयी सीज़िन्दगी है थकी रसोई सीतुम आओ के ये बर्तन खनकें ...२उसकी आँखों में मैंने बाँध दी आँखें अपनीऔर उसके दिल में जा कर खुल गया मैं हौले सेमुहब्बत की गिरह ..बंधे कहीं ..खुले कहीं ..३लिख दिया डायरी पे नाम तेरासहम के बैठ गया कोने मेंबम... [पूरी पोस्ट]
writer स्वप्निल कुमार 'आतिश'

triveni

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[24 Apr 2010 12:48 PM]

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