॥ एक पलड़े के तराजू वाले॥
(मुंडारी लोकगीत का काव्यांतर : दस)पहाड़ों की ढलान से उतरने वालेऔर तराई के रास्तों पर चलने वालेये व्यापारी गण।झूमते-झामते उतरने वाले औरआहिस्ता-आहिस्ता बढ़ने वालेये व्यापारी गण।इमली के वृक्ष तले सुस्ताने वालेअमराई में डेरा डालने वालेये व्यापारी गण।अरे भाई,...
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अरविन्द चतुर्वेद
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[24 Apr 2010 10:34 AM]



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