नहीं निगाह में मंजिल

कर्मनाशा फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की यह ग़ज़ल मुझे बहुत प्रिय है।आबिदा परवीन के स्वर में इसे सुनना तो एक अलग ही किस्म का अनुभव होता है। कैसा अनुभव ? अब क्या बताया जाय ! ऐसा किया जाय कि इसे पढ़ा और सुना जाय ..बस्स... नहीं निगाह में मंजिल तो जुस्तजू ही सही। नहीं विसाल मयस्सर... [पूरी पोस्ट]
writer sidheshwer

शामिलबाजा

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[24 Apr 2010 10:12 AM]

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