काली कारतूत पर साधुता की संज्ञा लिखाते-हिन्दी व्यंग्य कविता
शौहरत के शिखर पर वह बैठे हैं नीचे आने से उनको डर लगता है, उनके ऊंचे इंसान होने का वहम बना हुआ है लोगों में नीचे आने पर अपने बौने चरित्र की पहचान होने से उनका दिल घबड़ाने लगता है। ———- साधु ही हमेशा मौन की राह नहीं अपनाते, कसूरवार भी उसकी...
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दीपक भारतदीप
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[24 Apr 2010 09:21 AM]



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