संवाद
नहीं सुनी बाहर की आवाज अंदर शोर काफी था इतना बड़ा संसार हरे पेड़, सूखे सागर भी बहुत सी झीलें, चुप्पी साधतीं नदियां अंदर रौशनी की मेला भी, सुरंगों की गिनती कोई नहीं अपने कई, अपनेपन से दूर भी खिलखिलाहटें अंतहीन, नाजुक लकीरें भी सपने भर-भर छलकते रहे नहीं...
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डॉ वर्तिका नन्दा
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[24 Apr 2010 06:56 AM]



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